108+ प्रेरणादायक संस्कृत श्लोक (Sanskrit Shlok), Sanskrit Slokas, Sanskrit Slokas

इस पेज में 100 से भी अधिक प्रेरणादायक संस्कृत श्लोक (anskrit shlok) है। यह सभी Shlok in Sanskrit With Meaning in Hindi में दिए गए हैं ताकि आपको भी समझ में आए। जितने भी Sanskrit Mein Shlok इस बीच में दिए गए हैं वे सभी बहुत अधिक प्रेरणादायक है जो कि आम इंसान की जिंदगी में एक अहम भूमिका निभा सकते हैं यदि उन Sanskrit Slokas से शिक्षा ग्रहण की जाए।

व्यक्ति का जीवन इन संस्कृत में श्लोक को पढ़ने के बाद यदि उस पर अमल किया जाए तो व्यक्ति कभी भी असफल नहीं होगा। इस लिए इन सभी Sanskrit Shlok को पढ़ने के बाद जो भी संस्कृत श्लोक आपको पसंद कृपया उसे अपने दोस्तों के साथ शेयर अवश्य करे।

संस्कृत में श्लोक (Sanskrit Shlok) | Sanskrit Ke Shlok | Best Sanskrit Shlok

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सेवितव्यो महावृक्ष: फ़लच्छाया समन्वित:।

यदि देवाद फलं नास्ति,छाया केन निवार्यते।।

अर्थ – एक विशाल वृक्ष की सेवा करनी चाहिए। क्योंकि वह फल और छाया से युक्त होता है। यदि किसी दुर्भाग्य से फल नहीं देता तो उसकी छाया कोई नहीं रोक सकता है।

108+ प्रेरणादायक संस्कृत श्लोक (Sanskrit Shlok), Sanskrit Slokas, Sanskrit Slokas

Ek Vishal Pashu Ki Seva Karni chahie. Kyunki vah fal aur Chhaya Se yukt Hota Hai. Yadi kisi durbhagya se fal Nahin deta to uski Chhaya Koi Nahin rok sakta hai.

काक चेष्टा, बको ध्यानं, स्वान निद्रा तथैव च।

अल्पहारी, गृहत्यागी, विद्यार्थी पंच लक्षणं।।

अर्थ– हर विद्यार्थी में हमेशा कौवे की तरह कुछ नया सीखाने की चेष्टा, एक बगुले की तरह एक्राग्रता और केन्द्रित ध्यान एक आहत में खुलने वाली कुते के समान नींद, गृहत्यागी और यहाँ पर अल्पाहारी का मतबल अपनी आवश्यकता के अनुसार खाने वाला जैसे पांच लक्षण होते है।

108+ प्रेरणादायक संस्कृत श्लोक (Sanskrit Shlok), Sanskrit Slokas, Sanskrit Slokas

संस्कृत श्लोक (anskrit shlok) – Har Vidyarthi Mein Hamesha Kauve Ki Tarah Kuchh naya sikhane ki Chesta Ek bagule Ki Tarah Ek ragrata Aur Kendrit Dhyan ek Aahat mein khulne wali kutte ke Saman need grih Tyagi aur Yahan per alpahari ka matlab apni avashyakta ke anusar khane wala Jaise 5 Lakshan Hote Hain.

ददाति प्रतिगृह्णाति गुह्यमाख्याति पृच्छति।

भुङ्क्ते भोजयते चैव षड्विधं प्रीतिलक्षणम्।।

अर्थ – लेना, देना, खाना, खिलाना, रहस्य बताना और उन्हें सुनना ये सभी 6 प्रेम के लक्षण है।

Lena Dena khana khilana Rahsya batana aur unhen sunaya Sabhi Sab 6 Prem Ke Lakshan hai.

यस्मिन् देशे न सम्मानो न वृत्तिर्न च बान्धवाः।

न च विद्यागमोऽप्यस्ति वासस्तत्र न कारयेत्।।

अर्थ– ऐसा देश जहाँ पर कोई सम्मान नहीं हो, जीने के लिए कोई आजीविका नहीं मिले, कोई अपना भाई और बन्धु नहीं रहता हो, जहाँ पर विद्या ग्रहण करने की संभवना नहीं हो, ऐसे स्थान पर रहना नहीं चाहिए।

Aisa Desh Jahan per Koi Samman Nahin Ho Jeene Ke Liye Koi ajivika Nahin Mile koi apna bhai aur Bandhu Nahin rahata hun Jahan per Vidya grahan ki Sambhavna Nahin Ho Aise Sthan per Nahin Rahana chahie.

अग्निना सिच्यमानोऽपि वृक्षो वृद्धिं न चाप्नुयात्।

तथा सत्यं विना धर्मः पुष्टिं नायाति कर्हिचित्।।

अर्थ – आग से सींचे गए पेड़ कभी बड़े नहीं होते। उसी प्रकार सत्य के बिना धर्म की स्थापना संभव नहीं है।

Aage se Sheeshe Gaye ped kebhi Bade Nahin Hote . Usi Prakar Satya Ke Bina Dharm ki sthapna Sambhav Nahin Hai.

Shlok in Sanskrit With Hindi Meaning

दुर्जन:स्वस्वभावेन परकार्ये विनश्यति।

नोदर तृप्तिमायाती मूषक:वस्त्रभक्षक:।।

अर्थ – दुष्ट व्यक्ति का स्वभाव ही दूसरे के कार्य बिगाड़ने का होता है। वस्त्रों को काटने वाला चूहाकभी भी पेट भरने के लिए कपड़े नहीं काटता।

संस्कृत श्लोक (anskrit shlok) – Dusht vyakti ka swabhav hi dusre ke Karya bigadne ka Hota Hai vastro ko kaatne wala Chuha kabhi bhi pet bharane ke liye kapde Nahin Katta.

सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दु:ख भाग्भवेत्

अर्थ – संसार में सभी सुखी हो, निरोगी हो, शुभ दर्शन हो और कोई भी ग्रसित ना हो।

Sansar Mein Sabhi Sukhi Ho nirogi ho Shubh Darshan Ho aur koi bhi grasit na ho.

काव्यशास्त्रविनोदेन कालो गच्छति धीमतां।

व्यसनेन च मूर्खाणां निद्रया कलहेन वा।।

अर्थ – बुद्धिमान लोग काव्य-शास्त्र का अध्ययन करने में अपना समय व्यतीत करते हैं। जबकि मुर्ख लोग निंद्रा, कलह और बुरी आदतों में अपना समय बिताते हैं।

Buddhiman log Kavya Shastra ka adhyayan karne mein Apna Samay vyatit Karte Hain. Jab ki murkh log nidra Kalah Aur Buri aadaton Mein Apna Samay batate Hain.

विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभ्य सह।

अविद्यया मृत्युं तीर्त्वाऽमृतमश्नुते।।

अर्थ – जो दोनों को जानता है, भौतिक विज्ञान के साथ-साथ आध्यात्मिक विज्ञान भी, पूर्व से मृत्यु का भय अर्थात् उचित शारीरिक और मानसिक प्रयासों से और उतरार्द्ध अर्थात् मन और आत्मा की पवित्रता से मुक्ति प्राप्त करता है।

Jo donon ko Jaanta hai hai bahut Vigyan ke sath sath aadhyatmik Vigyan bhi purv se mrityu ka bhay arthat uchit sharirik aur mansik prayaso se aur uthradhrya arthat Man Aur Atma ki pavitrata se Mukti prapt karta hai.

सहसा विदधीत न क्रियामविवेकः परमापदां पदम्।

वृणते हि विमृश्यकारिणं गुणलुब्धाः स्वयमेव संपदः। aur

अर्थ – हमें अचानक आवेश या जोश में आकर कोई काम नहीं करना चाहिए। क्योंकि विवेक हीनता सबसे बड़ी विपतियों का कारण होती है। इसके विपरीत जो व्यक्ति सोच समझकर कार्य करता है। गुणों से आकृष्ट होने वाली मां लक्ष्मी स्वयं ही उसका चुनाव कर लेती है।

Hamen Achanak avash ya Josh Mein Aakar Koi Kam Nahin Karna chahie Kyunki Vivek heenata sabse badi bipattiyon ka Karan hoti hai Iske viprit Jo vyakti Soch Samajh Kar Karya karta hai gunon se aakrisht Hone Wali Mahalaxmi Swayam hi Unka Chunav kar lete hain.

संस्कृत में श्लोक (Sanskrit Slokas)

यथा ह्येकेन चक्रेण न रथस्य गतिर्भवेत्।

एवं परुषकारेण विना दैवं न सिद्ध्यति।।

अर्थ – जैसे एक पहिये से रथ नहीं चल सकता। ठीक उसी प्रकार बिना पुरुषार्थ के भाग्य सिद्ध नहीं हो सकता है।

108+ प्रेरणादायक संस्कृत श्लोक (Sanskrit Shlok), Sanskrit Slokas, Sanskrit Slokas

संस्कृत श्लोक (anskrit shlok) – Jaise ek pahiye se Rath Nahin chal Sakta theek Usi Prakar Bina purusharth ke Bhagya Siddh Nahin ho sakta hai.

निश्चित्वा यः प्रक्रमते नान्तर्वसति कर्मणः।

अवन्ध्यकालो वश्यात्मा स वै पण्डित उच्यते।।

अर्थ – जिसके प्रयास एक दृढ़ प्रतिबध्दता से शुरू होते हैं जो कार्य पूर्ण होने तक ज्यादा आराम नहीं करते हैं जो समय बर्बाद नहीं करते हैं और जो अपने विचारों पर नियन्त्रण रखते हैं वह बुद्धिमान है।

Jiske Prayas Ek dridh pratibadhta se shuru Hote Hain Jo Karya purn hone Tak Jyada Aaram Nahin Karte Hain Jo Samay Barbad Nahin karte hain aur jo Apne vicharon per niyantran dekhte hain vah buddhiman hai.

दुर्जन:स्वस्वभावेन परकार्ये विनश्यति।

नोदर तृप्तिमायाती मूषक:वस्त्रभक्षक:।।

अर्थ – दुष्ट व्यक्ति का स्वभाव ही दूसरे के कार्य बिगाड़ने का होता है। वस्त्रों को काटने वाला चूहा पेट भरने के लिए कपड़े नहीं कटता।

dusht Vyakti ka swabhav hi dusre ke Karya Vigyan Ka karad Hota Hai Vastav ko kaatne wala Chuha ped bharane ke liye kapde nahin karta

कृते प्रतिकृतं कुर्यात्ताडिते प्रतिताडितम्।

करणेन च तेनैव चुम्बिते प्रतिचुम्बितम्।।

अर्थ – हर कार्रवाही के लिए एक जवाबी कार्रवाही होनी चाहिए। हर प्रहार के लिए एक प्रति-प्रहार और उसी तर्क से हर चुम्बन के लिए एक जवाबी चुम्बन।

Har karyvahi ke liye ek Jawabi karyvahi honi chahie Har prahar ke liye ek Prati prahar aur Usi Tarik Se har chumban ke liye ek Jawabi chumban.

अन्यायोपार्जितं वित्तं दस वर्षाणि तिष्ठति।

प्राप्ते चैकादशेवर्षे समूलं तद् विनश्यति।।

अर्थ– गलत तरीके से और अन्याय करके कमाया हुआ धन 10 वर्षों तक ही संचित किया हुआ रह सकता है। लेकिन वह धन अपने मूलधन सहित पूरा ग्यारहवें वर्ष नष्ट हो जाता है।

Galat tarike se aur Anyay Karke kamaya Hua Dhan 10 varshon tak hi sanchit kiya huaa rah sakta hai lekin vah Dhan Apne muldhan dam sahit Pura 11 varsh nasht ho jata hai.

Shlok in Sanskrit | Shlok Of Sanskrit

स्वगृहे पूज्यते मूर्खः स्वग्रामे पूज्यते प्रभुः।

स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान्सर्वत्र पूज्यते।।

अर्थ– एक मुर्ख की पूजा उसके घर में होती है, एक मुखिया की पूजा उसके गाँव में होती है, राजा की पूजा उसके राज्य में होती है और एक विद्वान की पूजा सभी जगह पर होती है।

108+ प्रेरणादायक संस्कृत श्लोक (Sanskrit Shlok), Sanskrit Slokas, Sanskrit Slokas

Ek Murkh ki Puja Uske ghar mein hoti hai Ek Mukhiya ki Puja Uske Gaon Mein hoti hai Raja Ki Puja Uske Rajya Mein hoti hai aur ek vidwan ki Puja sabhi jagah hoti hai

विद्यां ददाति विनयं विनयाद् याति पात्रताम्।

पात्रत्वात् धनमाप्नोति धनात् धर्मं ततः सुखम्।।

अर्थ – विद्या हमें विनम्रता प्रदान करती है। विनम्रता से योग्यता आती है व योग्यता से हमें धन प्राप्त होता है और इस धन से हम धर्म के कार्य करते है और सुखी रहते है।

Vidya Hamen vinamrata pradan Karti Hain vinamrata se yogyata Aati hai va yogyata se Hamen Dhan prapt hota hai aur is dhan se Ham Dharm ke Karya karte hain aur Sukhi rahte hain.

अपि मेरुसमं प्राज्ञमपि शुरमपि स्थिरम्।

तृणीकरोति तृष्णैका निमेषेण नरोत्तमम्।।

अर्थ – भले ही कोई व्यक्ति मेरु पर्वत की तरह स्थिर, चतुर, बहादुर दिमाग का हो लालच उसे पल भर में घास की तरह खत्म कर सकता है।

Bhale hi koi vyakti Meru Parvat ki tarah sthir Chatur Bahadur Dimag ka ho Lalach use Pal Bhar Mein Ghas ki tarah khatm kar sakta hai.

परस्वानां च हरणं परदाराभिमर्शनम्।

सचह्रदामतिशङ्का च त्रयो दोषाः क्षयावहाः।।

अर्थ– दूसरों के धन का अपहरण, पर स्त्री के साथ संसर्ग और अपने हितैषी मित्रों के प्रति घोर अविश्वास ये तीनों दोष जीवन का नाश करने वाले हैं।

Dusron ke Dhan ka Apaharan per Stri ke sath Sansagra aur apne hitaishi mitron ke Prati Ghor avishwas Ya teenon Dosh Jivan ka Nash Karne Wale Hain.

Best Sanskrit Shlok | Easy Sanskrit Shlok

न चोरहार्य न राजहार्य न भ्रतृभाज्यं न च भारकारि।

व्यये कृते वर्धति एव नित्यं विद्याधनं सर्वधनप्रधानम्।।

अर्थ – न चोर चुरा सकता है, न राजा छीन सकता है, न इसका भाइयों के बीच बंट वारा होता है और न ही संभलना कोई भर है। इसलिए खर्च करने से बढ़ने वाला विद्या रुपी धन, सभी धनों से श्रेष्ठ है।

Na Chor Chura sakta hai na raja chheen sakta hai n iska bhaiyon ke bich Batwara Hota Hai aur na hi sambhalna koi bhar hai isliye kharch karne se badane wali Vidya rupee Dharm Sabhi donon se shreshth hai.

सर्वे क्षयान्ता निचयाः पतनान्ताः समुच्छ्रयाः।

संयोगा विप्रयोगान्ता मरणान्तं च जीवितम्।।

अर्थ– सभी प्रकार के संग्रह का अंत क्षय है। बहुत ऊंचे चढ़ने के अंत नीचे गिरना है। संयोग का अंत वियोग है और जीवन का अंत मरण है।

संस्कृत श्लोक (anskrit shlok) – Sabhi Prakar ke sangrah Ka Ant kshay hai bahut acche chadhne ke ant niche girna hai Sanyog Ka Ant biyog hai aur Jivan Ka Ant Maran hi

न कश्चित कस्यचित मित्रं न कश्चित कस्यचित रिपु:।

व्यवहारेण जायन्ते, मित्राणि रिप्वस्तथा।।

अर्थ – न कोई किसी का मित्र होता है, न कोई किसी का शत्रु। व्यवहार से ही मित्र या शत्रु बनते हैं।

Na Koi Kisi Ka Mitra Hota Hai Na Koi Kisi Ka Shatru vyavhar se hi Mitra Shatru bante Hain

विश्वस्मिन अधुना अन्य:कुलव्रतम पालयिष्यति क:।।

अर्थ – ऐ हंस, यदि तुम दूध और पानी में फर्क करना छोड़ दोगे तो तुम्हारे कुलव्रत का पालन इस विश्व मे कौन करेगा। यदि बुद्धिमान व्यक्ति ही इस संसार मे अपना कर्त्तव्य त्याग देंगे तो निष्पक्ष व्यवहार कौन करेगा।

ye Hans Tum dudh aur Pani Mein Fark karna Chhod Doge To Tumhare kul Vrat ka Palan is Vishva mein kaun Karega Yadi buddhiman vyakti he is Sansar Mein Main Apna Kartavya Tyag Denge to nishpaksh vyavhar Kaun Karega

षड् दोषा: पुरुषेणेह हातव्या भूतिमिच्छता। gay

निद्रा तन्द्रा भयं क्रोध आलस्यं दीर्घसूत्रता।।

अर्थ – नींद, तन्द्रा (ऊँघना), डर, क्रोध, आलस्य और दीर्घ शत्रुता इन 6 दोषों को वैभव और उन्नति प्राप्त करने के लिए पुरूष को त्याग करना चाहिए।

need tandra ughana dar krodh aalsya aur dheergh shatruta in 6 dosho ko vaibhav aur unnati prapt karne ke liye purush ko tyag karana chahiye.

Best Sanskrit Ke Shlok

कार्यार्थी भजते लोकं यावत्कार्य न सिद्धति।

उत्तीर्णे च परे पारे नौकायां किं प्रयोजनम्।।

अर्थ – जब तक काम पूरे नहीं होते हैं तब तक लोग दूसरों की प्रशंसा करते हैं। काम पूरा होने के बाद लोग दूसरे व्यक्ति को भूल जाते हैं। ठीक उसी तरह जैसे नदी पार करने के बाद नाव का कोई उपयोग नहीं रह जाता है।

jab tak kam pure nhi hote hai tab tak log dusaro ki prashansa karte hai kam pura hone ke bad log dusare vyaki ko bhul jate hai theek usi tarah jaise nadi par karane ke bad nav ka koi upyog nahi rah jata hai.

माता शत्रुः पिता वैरी येन बालो न पाठितः।

न शोभते सभामध्ये हंसमध्ये बको यथा।।

अर्थ – जो माता पिता अपने बच्चो को शिक्षा से वंचित रखते हैं, ऐसे माँ बाप बच्चो के शत्रु के समान है। विद्वानों की सभा में अनपढ़ व्यक्ति कभी सम्मान नहीं पा सकता वह हंसो के बीच एक बगुले के सामान है।

jo mata pita apne bachcho ko Shiksha se vanchit rakhte Hain Aise man baap bacchon ke shatru ke saman hai vidvan ki sabha me anapad vakti kabhi bhi samman nahi pa sakta vah hanso ke bich ke bich ke bagule ke saman hai.

न विश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्ते नातिविश्वसेत्।

विश्वासाद् भयमभ्येति नापरीक्ष्य च विश्वसेत्।।

अर्थ– जो विश्वसनीय नहीं है, उस पर कभी भी विश्वास न करें। परन्तु जो विश्वासपात्र है, उस पर भी आंख मूंदकर भरोसा न करें। क्योंकि अधिक विश्वास से भय उत्पन्न होता है। इसलिए बिना उचित परीक्षा लिए किसी पर भी विश्वास न करें।

jo Vishvasaniy nahi hai ush par kabhi bhi viswash n kare parantu jo viswashptra hai us par bhi ankh mud kar bharosa n kare kyoki adhik viswash se bhay utapanna hota hai isliye bina uchit pariksha liye kisi par vishswash n kare

व्यसने वार्थकृच्छ्रे वा भये वा जीवितान्तगते।

विमृशंश्च स्वया बुद्ध्या धृतिमान नावसीदति।।

अर्थ– शोक में, आर्थिक संकट में या प्राणों का संकट होने पर जो अपनी बुद्धि से विचार करते हुए धैर्य धारण करता है। उसे अधिक कष्ट नहीं उठाना पड़ता।
Sok mein Arthik Sankat mein yah Prado ca Sankat hone per Jo apni Buddhi se vichar karte hue Dhairya dharan karta hai Adhik kasht nahin uthana padta hai

Sanskrit Mein Shlok

परो अपि हितवान् बन्धुः बन्धुः अपि अहितः परः।

अहितः देहजः व्याधिः हितम् आरण्यं औषधम्।।

अर्थ – यदि कोई अपरिचित व्यक्ति आपकी मदद करें तो उसको अपने परिवार के सदस्य की तरह ही महत्व दें और अपने परिवार का सदस्य ही आपको नुकसान देना शुरू हो जाये तो उसे महत्व देना बंद कर दें। ठीक उसी तरह जैसे शरीर के किसी अंग में कोई बीमार हो जाये तो वह हमें तकलीफ पहुंचती है। जबकि जंगल में उगी हुई औषधी हमारे लिए लाभकारी होती है।

Yah Koi Aparichit vyakti aapki madad Kare to usko Apne Parivar ke sadasya ki tarahi mahatva De aur apne Parivar ka sadasya hi aapko nuksan Dena shuru ho gaya hai to to use mein to Dena band kar de theek Usi Tarah Jaise Sharir ke kis Ang mein Koi bimar Ho Jaaye to vah Hamen taklif Deti Hai Jab ki jungle mein Lagi Hui aushadhi Hamare liye labhkari hoti hai

घमंड पर संस्कृत श्लोक

मूढ़ैः प्रकल्पितं दैवं तत परास्ते क्षयं गताः।

प्राज्ञास्तु पौरुषार्थेन पदमुत्तमतां गताः।।

अर्थ– भाग्य की कल्पना मूर्ख लोग ही करते हैं। बुद्धिमान लोग तो अपने पुरूषार्थ, कर्म और उद्द्यम के द्वारा उत्तम पद को प्राप्त कर लेते हैं।

Bhagya Kalpana murkh log hi Karte Hain buddhiman log 2 Apne purusharth Karam udyam ke a dwara Uttam pad ko prapt kar lete hain

शैले शैले न माणिक्यं,मौक्तिम न गजे गजे।

साधवो नहि सर्वत्र,चंदन न वने वने।।

अर्थ – प्रत्येक पर्वत पर अनमोल रत्न नहीं होते, प्रत्येक हाथी के मस्तक में मोती नहीं होता। सज्जन लोग सब जगह नहीं होते और प्रत्येक वन में चंदन नही पाया जाता।

Pratek Pawar per Anmol ratn Nahin Hote pratyek Hathi ke mastak Mein Moti Nahin Hota Sajjan log shab jagah Nahin Hote aur pratyek wan me chandan nahi paya jata

अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविन:।

चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशोबलं।।

अर्थ – बड़ों का अभिवादन करने वाले मनुष्य की और नित्य वृद्धों की सेवा करने वाले मनुष्य की आयु, विद्या, यश और बल ये हमेशा बढ़ती रहती है।

Bado ka abhivadan karne Wale manushya Ki nitya vrudho Ki Seva Karne Wale manushya Ki aayu Vidya yas aur Bal ye Hamesha Bhartiya Ratiya

Sanskrit Ke Shlok

शतेषु जायते शूरः सहस्रेषु च पण्डितः।

वक्ता दशसहस्रेषु दाता भवति वा न वा।।

अर्थ – सौ लोगों में से एक शूरवीर होता है। हजार लोगों में एक विद्वान होता है। दस हजार लोगों में एक अच्छा वक्ता होता है। वही लाखों में बस एक ही दानी होता है।

Logo mein se ek surveer Hota Hai hajaron Logon mein se ek Ek vidwan Hota Hai darja Logon Mein Ek Achcha vakta Hota Hai Vahi Lakhon Mein Se bas ek dani hota hai

श्रोत्रं श्रुतेनैव न कुंडलेन, दानेन पाणिर्न तु कंकणेन।

विभाति कायः करुणापराणां, परोपकारैर्न तु चन्दनेन।।

अर्थ – कानों में कुंडल पहन लेने से शोभा नहीं बढ़ती, अपितु ज्ञान की बातें सुनने से होती है। हाथों की सुन्दरता कंगन पहनने से नहीं होती बल्कि दान देने से होती है। सज्जनों का शरीर भी चन्दन से नहीं बल्कि परहित में किये गये कार्यों से शोभायमान होता है।

Kano Mein Kundal pahan Lene se Shobha nahi Bhartia hai apitu Gyan ki baten sunane se Hoti Hai Hathon Ki sundarta kangan Pahanane se nahi balki dan dene se hoti hai sajjano ka Sharir bhi Chandan se nahin balki per hit mein ki gye karyo se Shobha Yaman Hota Hai

अधमाः धनमिच्छन्ति धनं मानं च मध्यमाः।

उत्तमाः मानमिच्छन्ति मानो हि महताम् धनम्।।

अर्थ – निम्न कोटि के लोग सिर्फ धन की इच्छा रखते हैं। मध्यम कोटि का व्यक्ति धन और सम्मान दोनों की इच्छा रखता है। वहीं एक उच्च कोटि के व्यक्ति के लिए सिर्फ सम्मान ही मायने रखता है। सम्मान से अधिक मूल्यवान है।

Nimbu Kot Ke Log sirf Dhan ki ichcha Hote Hain Madhyam Koti ka vyakti daal aur Samman donon ki ichcha Dikhta Hai Vahi Ek Uchch Coti ka vyakti ke liye sirf samman hi mayane rakhta hai Samman se Adhik mulyavan hai

सुखार्थिनः कुतोविद्या नास्ति विद्यार्थिनः सुखम्।

सुखार्थी वा त्यजेद् विद्यां विद्यार्थी वा त्यजेत् सुखम्।।

अर्थ – सुख चाहने वाले को विद्या कहाँ से, और विद्यार्थी को सुख कहाँ से, सुख की इच्छा रखने वाले को विद्या और विद्या की इच्छा रखने वाले को सुख का त्याग कर देना चाहिए।

संस्कृत श्लोक (anskrit shlok) – Sukh chahane Wale Ko Vidya kahan se aur Vidyarthi ko Shubh kahan se a Sukh Ki ichcha rakhne Wale Ko Vidya aur Vidya ki ichcha rakhne Walon Ko Sukh Ka tyag kar dena chahie

Shlok in Hindi

अश्वस्य भूषणं वेगो मत्तं स्याद् गजभूषणं।

चातुर्यम् भूषणं नार्या उद्योगो नरभूषणं।।

अर्थ – घोड़े की शोभा उसके वेग से होती है और हाथी की शोभा उसकी मदमस्त चाल से होती है।नारियों की शोभा उनकी विभिन्न कार्यों में दक्षता के कारण और पुरुषों की उनकी उद्योगशीलता के कारण होती है।

Ghodo ki sobha usake veg se hoti hai hathi ki sobha uski madmast chal se hoti hai nariyo ki shobha unki vibhinna karyo me dakshata ke karan aur purusho ki unki Udyogsilta ke karan hoti hai

सत्यं रूपं श्रुतं विद्या कौल्यं शीलं बलं धनम्।

शौर्यं च चित्रभाष्यं च दशेमे स्वर्गयोनयः।।

अर्थ– स्तय, विनय, शास्त्रज्ञान, विद्या, कुलीनता, शील, बल, धन, शूरता और वाक्पटुता ये दस लक्षण स्वर्ग के कारण हैं।

stay vinay sastragyan vidhya kuleenta sheel bal dhan surata aur vakptuta se 10 lakshan swarg ke karan hai

आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।

नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति।।

अर्थ – व्यक्ति का सबसे बड़ा दुश्मन आलस्य होता है, व्यक्ति का परिश्रम ही उसका सच्चा मित्र होता है। क्योंकि जब भी मनुष्य परिश्रम करता है तो वह दुखी नहीं होता है और हमेशा खुश ही रहता है।

vyaki ka sabse bada dusman aalsya hota hai vyaki ka parishram hi uska sachcha mitra hota hai kyoki jab bhi manusya parishram karta hai to wah dukhi nahi hota aur hamesha khush hi rahta hai

संस्कृत में श्लोक | Slokas in Sanskrit

विद्यां ददाति विनयं विनयाद् याति पात्रताम्।

पात्रत्वात् धनमाप्नोति धनात् धर्मं ततः सुखम्।।

अर्थ – ज्ञान विनम्रता प्रदान करता है, विनम्रता से योग्यता आती है और योग्यता से धन प्राप्त होता है, जिससे व्यक्ति धर्म के कार्य करता है और सुखी रहता है।

Gyan vinamrata pradan karta hai vinamrata se yogyata aati hai aur Yogyata se Dhan prapt Hota Hai jisase vyakti Dharm ke karykarta aur Sukhi rahata hai

न विना परवादेन रमते दुर्जनोजन:।

काक:सर्वरसान भुक्ते विनामध्यम न तृप्यति।।

अर्थ – लोगों की निंदा किये बिना दुष्ट व्यक्तियों को आनंद नहीं आता। जैसे कौवा सब रसों का भोग करता है। परंतु गंदगी के बिना उसकी तृप्ति नहीं होती।

Logon ki Ninda kiye Bina dost vyaktiyon ko Anand Nahin Aata Hai Jaise kauya sab rasho ka bhog karta hai parntu gandagi ke bina us uski tripti nhi hoti

सत्य -सत्यमेवेश्वरो लोके सत्ये धर्मः सदाश्रितः।

सत्यमूलनि सर्वाणि सत्यान्नास्ति परं पदम्।।

अर्थ – उस संसार में सत्य ही ईश्वर है धर्म भी सत्य के ही आश्रित है, सत्य ही सभी भाव-विभव का मूल है, सत्य से बढ़कर और कुछ भी नहीं है।

uas Sansar Mein Satya hi Ishwar hai dharma bhi satya ke hi ashrith hai Satya hi sabhi bhaw vibhaw ka mul hai satya se badakar aur kuch bhi nahi hai

देवो रुष्टे गुरुस्त्राता गुरो रुष्टे न कश्चन:।

गुरुस्त्राता गुरुस्त्राता गुरुस्त्राता न संशयः।।

अर्थ – भाग्य रूठ जाये तो गुरू रक्षा करता है। गुरू रूठ जाये तो कोई नहीं होता। गुरू ही रक्षक है, गुरू ही शिक्षक है, इसमें कोई संदेह नहीं।

Bhag ruth Jaaye to Guru Raksha karta hai guru ruth Jaaye to Koi Nahin Hota Guru hi Rakshak hai Guru Hi Shikshak hai ismein Koi Sandeh nahi

Sanskrit Slokas

स्तस्य भूषणम दानम, सत्यं कंठस्य भूषणं।

श्रोतस्य भूषणं शास्त्रम,भूषनै:किं प्रयोजनम।।

अर्थ – हाथ का आभूषण दान है, गले का आभूषण सत्य है, कान की शोभा शास्त्र सुनने से है, अन्य आभूषणों की क्या आवश्यकता है।

Hath ka abhushan dan hai gale ka Abhushan Satya hai Kan ki sobha shastra sunane se hai anya aabhusado ki kya aawasykta hai

भूमे:गरीयसी माता,स्वर्गात उच्चतर:पिता।

जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गात अपि गरीयसी।।

अर्थ – भूमि से श्रेष्ठ माता है, स्वर्ग से ऊंचे पिता हैं, माता और मातृभूमि स्वर्ग से भी श्रेष्ठ हैं।

Bhumi se shreshth Mata hai Swarg Se uche Pita Hai Mata aur Mathrubhumi Swarg Se Bhi shreshth Hai

श्वः कार्यमद्य कुर्वीत पूर्वान्हे चापरान्हिकम्।

न हि प्रतीक्षते मृत्युः कृतमस्य न वा कृतम्।।

अर्थ–जिस काम को कल करना है उसे आज और जो काम शाम के समय करना हो तो उसे सुबह के समय ही पूर्ण कर लेना चाहिए। क्योंकि मृत्यु कभी यह नहीं देखती कि इसका काम अभी भी बाकी है।

Jis kam ko kal karna hai use Aaj Aur Jo kam Sham ke Samay karna ho to use Subah ke Samay hi purn kar lena chahie

Sanskrit Mein Shlok

दुर्जन:परिहर्तव्यो विद्यालंकृतो सन।

मणिना भूषितो सर्प:किमसौ न भयंकर:।।

अर्थ – दुष्ट व्यक्ति यदि विद्या से सुशोभित भी तो अर्थात् वह विद्यावान भी हो तो भी उसका परित्याग कर देगा। चाहिए जैसे मणि से सुशोभित सर्प क्या भयंकर नहीं होता?

संस्कृत श्लोक (anskrit shlok) – Dusht vyakti Vidya se sushobhit bhi to arthat vah vidyawaan bhi ho to bhi uska Upkar prityag Kar Dega chahie Jaise Manish se sushobhit sarp kya bhayankar nhi hota

उपदेशो हि मूर्खाणां प्रकोपाय न शान्तये।

पयःपानं भुजंगानां केवलं विषवर्द्धनम्।।

अर्थ– मूर्खों को दिया हुआ उपदेश उनके क्रोध को बढ़ाता ही है शांत नहीं करता। जिस प्रकार साँपों को पिलाया हुआ दुध हमेशा उनका विष ही बढ़ाता है।

Murkho Ko Diya Hua updesh unke Krodh ko badata hi hai Shant nahin karta Jis Prakar sapo ko Pilaya hua dudh Hamesha Unka Vish hi badata hai

न विना परवादेन रमते दुर्जनोजन:।

काक:सर्वरसान भुक्ते विनामध्यम न तृप्यति।।

अर्थ – लोगों की निंदा (बुराई) किये बिना दुष्ट (बुरे) व्यक्तियों को आनंद नहीं आता। जैसे कौवा सब रसों का भोग करता है परंतु गंदगी के बिना उसकी संतुष्टि नहीं होती।

Logon ki Ninda Burai kiye Bina dust bure vyaktiyon ko Anand hai jaise kauva sab ka bhog karata hai parantu gandgi Ke Bina uski santushti Nahin Hoti

Shlok in Sanskrit With Meaning in Hindi

न देवा दण्डमादाय रक्षन्ति पशुपालवत।

यं तु रक्षितमिच्छन्ति बुद्धया संविभजन्ति तम्।।

अर्थ– देवता कभी मनुष्यों की रक्षा चरवाहों की भांति डंडा लेकर नहीं करते। जिसकी देवता रक्षा करना चाहते है, उसे उसकी रक्षा के लिए स्वरक्षा के लिए सद्बुद्धि प्रदान करते है।

Devta Kabhi manushya ki Raksha charwaho Ki Baati danda lekar nahi karte jiski devta raksha karna hai use Uski raksha ke liye swaraksha ke liye sadbuddhi pradan Karen

पृथ्वियां त्रीणि रत्नानि जलमन्नम सुभाषितं।

मूढ़े: पाधानखंडेषु रत्नसंज्ञा विधीयते।।

अर्थ – पृथ्वी पर तीन रत्न हैं जलअन्न और शुभ वाणी पर मुर्ख लोग पत्थर के टुकड़ों को रत्न की संज्ञा देते हैं।

Prithvi par 3 Ratna Hai Jal anna aur shubh wadi par murkh log Pathar Ke Tukdon ko ratn ki Sangya Dete Hain

सृष्टिस्थितिविनाशानां शक्तिभूते सनातनि।

गुणाश्रये गुणमये नारायणि नमोऽस्तु ते।।

अर्थ – तुम सृष्टि, पालन और संहार की शक्ति भूता, सनातनी देवी, गुणों का आधार तथा सर्वगुणमयी हो। नारायणि! तुम्हे नमस्कार है।

Tum Srishti Palan aur sanhar ki sakti Bhuta sanatani Devi Guru ka Aadhar tatha Sarv Guru mai Ho Narayani Tumhe namaskar hai

यथा चतुर्भिः कनकं परीक्ष्यते निर्घषणच्छेदन तापताडनैः।

तथा चतुर्भिः पुरुषः परीक्ष्यते त्यागेन शीलेन गुणेन कर्मणा।।

अर्थ – जिस प्रकार सोने का परिक्षण घिसने, काटने, तापने और पीटने जैसे चार प्रकारों से होता है। ठीक उसी प्रकार पुरूष की परीक्षा त्याग, शील, गुण और कर्मों से होती है।

Jis Prakar Sone Ka parikshan ghisne kaatne tapman aur pitna Jaise Char Prakar se hota hai theek Usi Prakar Purush ki Pariksha Tyag sil gud aur Karmon Se Hoti Hai

पुस्तकस्था तु या विद्या,परहस्तगतं च धनम्।

कार्यकाले समुत्तपन्ने न सा विद्या न तद् धनम्।।

अर्थ – किसी पुस्तक में रखी विद्या और दूसरे के हाथ में गया धन। ये दोनों जब जरूरत होती है तब हमारे किसी भी काम में नहीं आती।

Kisi Pustak Mein Rakhi Vidya aur dusre ke Hath Mein gaya dhan yah donon Jab jarurat Hoti Hai tab Hamare Kisi bhi kam mein nahin aati

यद्यत्संद्दश्यते लोके सर्वं तत्कर्मसम्भवम्।

सर्वां कर्मांनुसारेण जन्तुर्भोगान्भुनक्ति वै।।

अर्थ – लोगों के बीच जो सुख या दुःख देखा जाता है कर्म से पैदा होता है। सभी प्राणी अपने पिछले कर्मों के अनुसार आनंद लेते हैं या पीड़ित होते हैं।

Logon ke bich Jo Sukh ya Dukh dekha jata hai karm se Paida Hota Hai Sabhi prani Apne Pichhle Karmon Ke anusar Anand Dete Hain ya pidit Hote Hain

आयुर्वित्तं गृहच्छिद्रं मन्त्रमैथुनभेषजम्।

दानमानापमानं च नवैतानि सुगोपयेत्।। han

अर्थ– हर व्यक्ति को अपनी आयु, गृह के दोष, मैथुन, मन्त्र, धन, दान, औषधि, मान-सम्मान, अपने अपमान, अपनी योग्यता को हमेशा सभी से छुपाकर ही रखना चाहिए अन्यथा कभी भी नुकसान झेलना पड़ सकता है।

Har vyakti ko apni aayu Grih ke dosh maidhun mantra Dhan Dhan aushadhi Maan Samman Apne apman apni yogyata ko Hamesha Sabhi se Chhupa kar Rakhna chahie anyatha kabhi bhi nuksan Jalana pad sakta hai

वाणी रसवती यस्य,यस्य श्रमवती क्रिया।

लक्ष्मी : दानवती यस्य,सफलं तस्य जीवितं।।

अर्थ – जिस मनुष्य की वाणी मीठी हो, जिसका काम परिश्रम से भरा हो, जिसका धन दान करने में प्रयुक्त हो, उसका जीवन सफ़ल है।

Jis manushya ki Vani Mitti Ho Jiska kam Parishram se Bhara Ho Jiska Dhan Dan karne mein prayukt ho uska Jivan kahan hai

Shlok in Sanskrit

मूर्खशिष्योपदेशेन दुष्टास्त्रीभरणेन च।

दुःखितैः सम्प्रयोगेण पण्डितोऽप्यवसीदति।।

अर्थ– मुर्ख शिष्यों को पढ़ाकर, दुष्ट स्त्री के साथ अपना जीवन बिताकर, रोगियों और दुखियों के साथ रहकर विद्वान भी दुखी हो जाता है।

Murkh Shishyo ko padhakar dusht Stri ke sath Apna Jivan Bitha kar rogiyon aur dukhiyon ke sath Rahakar vidwan bhi dukhi ho jata hai

मूर्खा यत्र न पूज्यते धान्यं यत्र सुसंचितम्।

दंपत्यो कलहं नास्ति तत्र श्रीः स्वयमागतः।।

अर्थ – जहाँ मूर्ख को सम्मान नहीं मिलता हो, जहाँ अनाज अच्छे तरीके से रखा जाता हो और जहाँ पति-पत्नी के बीच में लड़ाई नहीं होती हो, वहाँ लक्ष्मी खुद आ जाती है।

Jahan Murga ko Samman Nahin Milta Ho Jahan Anaaj acche tarike Se Rakha Jata Ho Aur Jahan Pati Patni ke bich me Ladai Nahin Hoti Ho vahan Lakshmi Khud a Jaate Hain

येषां न विद्या न तपो न दानं ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः।

ते मर्त्यलोके भुविभारभूता मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति।।

अर्थ – जिस मनुष्यों में विद्या का निवास है, न मेहनत का भाव, न दान की इच्छा और न ज्ञान का प्रभाव, न गुणों की भिव्यक्ति और न धर्म पर चलने का संकल्प, वे मनुष्य नहीं वे मनुष्य रूप में जानवर ही धरती पर विचरते हैं।

Jis manushya mein Vidya ka Nivas Hai n mehnat ka bhav N dan Ki ichcha Na Gyan ka prabhaw n gudo ki bhivyakti aur n Dharm per chalne ka Sankalp we manushya Nahin manushya ke roop mein Janwar hi Dharti per bhi Chalte Hain

गुरुर्ब्रह्मा ग्रुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।

गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः।।

अर्थ – गुरू ही ब्रह्मा हैं, गुरू ही विष्णु हैं, गुरू ही शंकर है, गुरू ही साक्षात परमब्रह्म हैं। ऐसे गुरू का मैं नमन करता हूं |

Guru hi Brahma hai Guru hi Vishnu Guru hi Shankar hai guru hi sakshat Param Brahma hai Aise Guru Ko Mai naman karta hun

संस्कृत श्लोक

उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।

न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगा:।।

अर्थ – व्यक्ति के मेहनत करने से ही उसके काम पूरे होते हैं, सिर्फ इच्छा करने से उसके काम पूरे नहीं होते। जैसे सोये हुए शेर के मुंह में हिरण स्वयं नहीं आता, उसके लिए शेर को परिश्रम करना पड़ता है।

Vyakti ke mehnat karne se hi Uske kam pure hote hain shirf ichchha Karne Se Uske kam pura Nahin hota hai Jaise Soye Hue Sher ke Munh mein hiran swayam nhi aata uske liye sher ko parishram karna padata hai

मूर्खस्य पञ्च चिह्नानि गर्वो दुर्वचनं तथा।

क्रोधश्च दृढवादश्च परवाक्येष्वनादरः।।

अर्थ – एक मुर्ख के पांच लक्षण होते है घमण्ड, दुष्ट वार्तालाप, क्रोध, जिद्दी तर्क और अन्य लोगों के लिए सम्मान में कमी।

ek murkh ke 5 lakshan hote hai ghamand dusht vartalap krodh jiddi tark aur anya logo ke liye samman me kami.

न स्वल्पस्य कृते भूरि नाशयेन्मतिमान् नरः।

एतदेवातिपाण्डित्यं यत्स्वल्पाद् भूरिरक्षणम्।।

अर्थ– थोड़े के लिए अधिक का नाश न करे, बुद्धिमत्ता इसी में है। बल्कि थोड़े को छोड़कर अधिक की रक्षा करे।

thode ke kiye adhik ka nash n kare buddhimatta isi me hai balki thode ko chhodekar adhik ki raksha kare

काव्यशास्त्रविनोदेन कालो गच्छति धीमतां।

व्यसनेन च मूर्खाणां निद्रया कलहेन वा।।

अर्थ – बुद्धिमान लोग काव्य-शास्त्र का अध्ययन करने में अपना समय व्यतीत करते हैं। जबकि मूर्ख लोग निद्रा, कलह और बुरी आदतों में अपना समय बिताते हैं।

buddhiman log kavya shastra ka adhyayan karne me apna samay vyatit karte hai jabki murkh log nidtra kalah aur buri aadto me apna samay bitate hai

यत्र स्त्री यत्र कितवो बालो यत्रानुशासिता।

मज्जन्ति तेवशा राजन् नद्यामश्मप्लवा इव।।

अर्थ– जहां का शासन स्त्री, जुआरी और बालक के हाथ में होता है। वहां के लोग नदी में पत्थर की नाव में बैठने वालों की भांति विवश होकर विपत्ति के समुद्र में डूब जाते हैं।

संस्कृत श्लोक (anskrit shlok) – Jahan Ka shasan Stri juaari aur balak ke Hath Mein Hota Hai Wahan Ke Log Nadi Mein Pathar Ki nav baithane Walon Ki Bati vivash hokar vipatti ke samudra Mein Doob Jaate Hain

Sanskrit Shlok

प्रियवाक्य प्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः।

तस्मात तदैव वक्तव्यम वचने का दरिद्रता।।

अर्थ – प्रिय वाक्य बोलने से सभी जीव संतुष्ट हो जाते हैं, अतः प्रिय वचन ही बोलने चाहिए। ऐसे वचन बोलने में कंजूसी कैसी।

priy Vakya bolane se Sabhi Jeev santusht Ho Jaate Hain Atta priy vchan hi bolna chahiye Aise Vachan bolane Mein Kaisi kanjusi

सत्यं ब्रूयात प्रियं ब्रूयात न ब्रूयात सत्यं प्रियम।

प्रियं च नानृतं ब्रूयात एष धर्म: सनातन:।।

अर्थ – सत्य बोलो, प्रिय बोलो, अप्रिय लगने वाला सत्य नहीं बोलना चाहिए प्रिय लगने वाला असत्य भी नहीं बोलना चाहिए।

Satya bolo Priya bolo Priya lagne wala Satya Nahin bolna chahie Priya lagne wala asatya bhi nahin bolna chahie

यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा, शास्त्रं तस्य करोति किं।

लोचनाभ्याम विहीनस्य, दर्पण:किं करिष्यति।।

अर्थ – जिस व्यक्ति के पास स्वयं का विवेक नहीं है। शास्त्र उसका क्या करेगा? जैसे नेत्रहीन व्यक्ति के लिए दर्पण व्यर्थ है।

Jis vyakti ke pass Swayam ka Vivek Nahin Hai Shastra Uska Kya karega jaise netrhin vyakti ke liye Darpan vyarth hai

अनादरो विलम्बश्च वै मुख्यम निष्ठुर वचनम।

पश्चतपश्च पञ्चापि दानस्य दूषणानि च।।

अर्थ – अपमान करके देना, मुंह फेर कर देना, देरी से देना, कठोर वचन बोलकर देना और देने के बाद पछ्चाताप होना। ये सभी 5 क्रियाएं दान को दूषित कर देती है।

Apman karke dena Munh Fer kar dena deri se Dena Kathor Vachan bolkar Dena aur dene ke bad pachatap hona ye Sabhi 5 kriyaye dan ko dushit kar dete Hain

विद्या मित्रं प्रवासेषु,भार्या मित्रं गृहेषु च।

व्याधितस्यौषधं मित्रं, धर्मो मित्रं मृतस्य च।।

अर्थ – विदेश में ज्ञान, घर में अच्छे स्वभाव और गुणस्वरूप पत्नी, औषध रोगी का तथा धर्म मृतक का सबसे बड़ा मित्र होता है।

Videsh Mein Gyan ghar mein acche swabhav aur good Swaroop Patni ausadh Rogi ka tatha Dharm mrutak ka sabse bada Mitra Hota Hai

विद्वत्वं च नृपत्वं च नैव तुल्यं कदाचन।

स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान् सर्वत्र पूज्यते।।

अर्थ – एक विद्वान और राजा की कभी कोई तुलना नहीं की जा सकती। क्योंकि राजा तो केवल अपने राज्य में सम्मान पाता है वही एक विद्वान हर जगह सम्मान पाता है।

Ek vidwan Aur Raja Ki Kabhi Koi tulna Nahin Ki Ja sakti Kyunki Raja to keval apne Rajya Mein Samman Pata Hai Vahi Ek vidwan Har Jagah Samman pata hai

अबन्धुर्बन्धुतामेति नैकट्याभ्यासयोगतः।

यात्यनभ्यासतो दूरात्स्नेहो बन्धुषु तानवम्।।

अर्थ– बार बार मिलने से अपरिचित भी मित्र बन जाते हैं। दूरी के कारण न मिल पाने से बन्धुओं में स्नेह कम हो जाता है।

Bar Bar milane se Aparichit bhi Mitra Ban Jaate Hain Duri Ke Karan na mil pane se bandhuon mein Sneh kam ho jata hai

प्रथमेनार्जिता विद्या द्वितीयेनार्जितं धनं।

तृतीयेनार्जितः कीर्तिः चतुर्थे किं करिष्यति।।

अर्थ – जिसने पहले आश्रम अर्थात् ब्रह्मचर्य आश्रम में विद्या को अर्जित नहीं की, द्वितीय आश्रम (ग्रहस्थ) में धन को अर्जित नहीं किया हो, तीसरे आश्रम (वानप्रस्थ) में कीर्ति अर्जित नहीं की तो वह चतुर्थ (सन्यास) आश्रम में क्या करेगा?

Jisne pahle aashram arthat brahmcharya aashram Mein Vidya ko Arijit Nahin Ki dwitiy aashram grahsth mein Dhan ko Arijit nahin kiya ho Teesri aashram vanprasth me kirti Arijit nahin kiya wah chaturth Sanyas Ashram kya Karega

किन्नु हित्वा प्रियो भवति। किन्नु हित्वा न सोचति।।

किन्नु हित्वा अर्थवान् भवति। किन्नु हित्वा सुखी भवेत्।।

अर्थ – किस चीज को छोड़कर मनुष्य प्रिय होता है? कोई भी चीज किसी का हित नहीं सोचती? किस चीज का त्याग करके व्यक्ति धनवान होता है? और किस चीज का त्याग कर सुखी होता है?

Kis chij Ko chhodkar manushya Priya hota hai koi bhi chij kisi ka hit Nahin sochati kis chij ka Tyag Kar Ke vyakti Dhanwan hota hai aur kis chij ka Tyag kar Sukhi Hota Hai

Shlok in Sanskrit

अयं निजः परो वेति गणना लघु चेतसाम्।

उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्।।

अर्थ – जिनका हृदय बड़ा होता है, उनके लिए पूरी धरती ही परिवार होती है और जिनका हृदय छोटा है, उनकी सोच वह यह अपना है, वह पराया है की होती है।

Jinka hriday Bada hota hai unke liye Puri Dharti hi Parivar hota hai aur Unka hriday Chhota Hai Unki Soch vah apna hai vah paraayaa hai ki hoti hai

निरपेक्षो निर्विकारो निर्भरः शीतलाशयः।

अगाधबुद्धिरक्षुब्धो भव चिन्मात्रवासनः।।

अर्थ – आप सुख साधन रहित, परिवतर्नहीन, निराकार, अचल, अथाह जागरूकता औ deर अडिग हैं। इसलिए अपनी जाग्रति को पकड़े रहो।

Aap Sukh sadhan Rahit Parivartanhin nirakar Achal athah jagrukta aur adig hai isliye apni Jagriti ko pakde raho

यस्तु संचरते देशान् यस्तु सेवेत पण्डितान्।

तस्य विस्तारिता बुद्धिस्तैलबिन्दुरिवाम्भसि।।

अर्थ – जो व्यक्ति भिन्न-भिन्न देशों में यात्रा करता है और विद्वानों से सम्बन्ध रखता है। उस व्यक्ति की बुध्दि उसी तरह होती है जैसे तेल की एक बूंद पूरे पानी में फैलती है।

Jo vyakti bhinn bhinn deshon Mein Yatra karta hai aur Vigyan se sambandh Rakhta hai use vyakti ki Buddhi Usi Tarah Hoti Hai Jaise Tel Ki Ek Boond Pani Mein failati Hai

मातृवत परदारांश्च परद्रव्याणि लोष्टवत्।

आत्मवत् सर्वभूतानि यः पश्यति स पश्यति।।

अर्थ– पराई स्त्री अर्थात किसी अन्य की पत्नी को अपनी मां के समान, दूसरे के धन को मिट्टी की तरह और सभी प्राणियों को अपने समान ही देखता है। असल में वो ही ज्ञानी है।

Paraai Stri arthat Kisi Anya ki patni ko apni Maa ke Saman dusre ke Dhan ko Mitti Ki Tarah aur sabhi praniyon ko Apne Saman hi dekhta Hai Asal Mein Vahi Gyani Hota Hai

न कश्चित कस्यचित मित्रं न कश्चित कस्यचित रिपु:।

व्यवहारेण जायन्ते, मित्राणि रिप्वस्तथा।।

अर्थ – न कोई किसी का मित्र होता है। न कोई किसी का शत्रु। व्यवहार से ही मित्र या शत्रु बनते हैं।

Na Koi Kisi Ka Mitra Hota Hai Koi Kisi Ka Shatru vyavhar se hi Mitra Shatru bante Hain

स जातो येन जातेन याति वंशः समुन्नतिम्।

परिवर्तिनि संसारे मृतः को वा न जायते।।

अर्थ– संसार में जन्म मरण का चक्र चलता ही रहता है। लेकिन जन्म लेना उसका सफल है। जिसके जन्म से कुल की उन्नति हो।

Sansar Mein Janm Maran ka Chakra Chalta hi rahata hai lekin Janm Lena uska Safal Hai jeans ke Janm se kul ki Unnati Hoon

धृतिः शमो दमः शौचं कारुण्यं वागनिष्ठुरा।

मित्राणाम् चानभिद्रोहः सप्तैताः समिधः श्रियः।।

अर्थ– धैर्य, मन पर अंकुश, इन्द्रियसंयम, पवित्रता, दया, मधुर वाणी मित्र से द्रोह न करना ये सात चीजें लक्ष्मी को बढ़ाने वाली हैं।

Dhairya man per Ankush indriyasanyam pavitrata Daya Madhur Vani aur Mitra Mein Dhruv Na Karna yah Sath chijen Lakshmi ko badhane Wali Hai

दयाहीनं निष्फलं स्यान्नास्ति धर्मस्तु तत्र हि।

एते वेदा अवेदाः स्यु र्दया यत्र न विद्यते।।

अर्थ – बिना दया के किये गये काम में कोई फल नहीं मिलता, ऐसे काम में धर्म नहीं होता जहां दया नहीं होती। वहां वेद भी अवेद बन जाते हैं।

Bina Daya ke kiye Gaye kam Mein Koi fal Nahin milata Aise kam Mein Dharm Nahin Hota Jahan Daya Nahin Hoti vaha Wed Bhi awed Ban Jaate Hain

प्रेम पर संस्कृत श्लोक

प्रदोषे दीपक : चन्द्र:,प्रभाते दीपक:रवि:।

त्रैलोक्ये दीपक:धर्म:,सुपुत्र: कुलदीपक:।।

अर्थ – संध्या काल में चन्द्रमा दीपक है, प्रभात काल में सूर्य दीपक है, तीनों लोकों में धर्म दीपक है और सुपुत्र कूल का दीपक है।

Sandhya kal Mein Chandrama Deepak hai prabhat kal Mein Surya Deepak Hai teenon Logon Mein Dharm Deepak hai aur suputra kul ka Deepak hai

यावद्बध्दो मरुद देहे यावच्चित्तं निराकुलम्।

यावद्द्रॄष्टिभ्रुवोर्मध्ये तावत्कालभयं कुत:।।

अर्थ – जब तक शरीर में सांस रोक दी जाती है तब तक मन अबाधित रहता है और जब तक ध्यान दोनों भौहों के बीच लगा है तब तक मृत्यु से कोई भय नहीं है।

Jab tak Sharir Mein Sans Rog De Jaate Hain tab tak man abadhit rahta aur jab tak Dhyan donon bhauho ke bich Laga Hai tab tak mrityu Se Koi bhay nahin hai

Sanskrit Mein Shlok

अर्थ – हे परम पिता परमेश्वर मैं आपसे यही प्रार्थना करता हूं कि मुझे सदबुद्धि देना और हमेशा सही मार्ग पर चलता रहूं ।

He parampita Parmeshwar mai aapse Yahi prathana karta hun Ki Mujhe Sar Buddhi Dena aur Hamesha Sahi Marg per chalta rahu

यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षनति।

शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः।।

अर्थ – जो पुरूष न कभी हर्षित होता है, न कभी द्वेष करता है, न कभी शोक करता है, न कामना करता हैं और जो शुभ और अशुभ सभी कर्मों का त्यागी हो, वह भक्तियुक्त मनुष्य मेरे को प्रिय है।

Jo Purush Na Kabhi Harshit hota na Kabhi Dwesh Karta Hai Na Kabhi Sok karta hai na Kamna Karta aur jo Shubh aur ashubh Sabhi Karmon ka Tyagi Ho vah bhaktiyukt mere ko priy hai

अष्टादस पुराणेषु व्यासस्य वचनं द्वयम्।

परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम्।।

अर्थ – अठारह पुराणों में व्यास के दो वचन ही है। पहला परोपकार ही पुण्य है और दूसरा औरों को दुःख पहुंचाना पाप है।

18 puranon Mein Vyas ke 2 vachan hi hai pahla paropkari hi purn hai aur dusra Auron ko Dukh pahchana Paap hai

अलसस्य कुतः विद्या अविद्यस्य कुतः धनम्।

अधनस्य कुतः मित्रम् अमित्रस्य कुतः सुखम्।।

अर्थ – आलसी व्यक्ति को विद्या कहां, मुर्ख और अनपढ़ और निर्धन व्यक्ति को मित्र कहां, अमित्र को सुख कहां।

Aalsi vyakti ko Vidya kahan murkh aur Anpadh aur Nirdhan vyakti ko Mitra kahan Amit ko Sukh Kahan

पृथ्वियां त्रीणि रत्नानि जलमन्नम सुभाषितं।

मूढ़े: पाधानखंडेषु रत्नसंज्ञा विधीयते।।

अर्थ – पृथ्वी पर तीन रत्न हैं- जल,अन्न और शुभ वाणी। पर मूर्ख लोग पत्थर के टुकड़ों को रत्न की संज्ञा देते हैं।

Prithvi par 3 Rakhna Hai Jal ann aur Shubh Vani per murkh log Pathar Ke Tukdon ko ratn ki Sangya Dete Hain

मा भ्राता भ्रातरं द्विक्षन्‌, मा स्वसारमुत स्वसा।

सम्यञ्च: सव्रता भूत्वा वाचं वदत भद्रया।।

अर्थ – भाई अपने भाई से कभी द्वेष नहीं करें, बहन अपनी बहन से द्वेष नहीं करें, समान गति से एक दूसरे का आदर-सम्मान करते हुए परस्पर मिल-जुलकर कर्मों को करने वाले होकर अथवा एकमत से प्रत्येक कार्य करने वाले होकर भद्रभाव से परिपूर्ण होकर संभाषण करें।

Bhai apne bhai se Kabhi dwesh Nahin Karen vahan Apne vahan se Dwesh Nahin Karen Saman Gati se ek dusre ka aadar Samman karte hue persper mil jul kar Karmon ko karne wale hokar athva ekmat se pratyek Karya Karne Wale hokar bhadra Bhav se paripurn hokar sambhashan Karen

यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवताः।

यत्र तास्तु न पूज्यंते तत्र सर्वाफलक्रियाः।।

अर्थ – जहाँ पर हर नारी की पूजा होती है वहां पर देवता भी निवास करते हैं और जहाँ पर नारी की पूजा नहीं होती, वहां पर सभी काम करना व्यर्थ है।

Jahan per Har Nari ki Puja Hoti Hai vahan Ka Devta bhi niwash karte hain vah Jahan per Nari ke Puja Nahin Hoti vahan per Sabhi kam karna vyast hai

ॐ असतो मा सद्गमय।

तमसो मा ज्योतिर्गमय।

मृत्योर्मामृतं गमय।।

अर्थ – हे प्रभु, हम सभी को असत्य से दूर सत्य की ओर ले चलो घोर अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो, मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो।

He Prabhu Ham sabhi ko asataye Se Dur Satya ki or le chalo Ghor andhkar se prakash ki aur le chalo mrutyu se amarta ki aur le chalo

भूमे:गरीयसी माता,स्वर्गात उच्चतर:पिता।

जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गात अपि गरीयसी।।

अर्थ – भूमि से श्रेष्ठ माता है, स्वर्ग से ऊंचे पिता हैं। माता और मातृभूमि स्वर्ग से भी श्रेष्ठ हैं।

bhumi se shreshth mata hai swarg se unche pita hai mata aur matrabhumi swarg se bhi shreshth hai

उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः।

षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्।।

अर्थ – जो जोखिम लेता हो (उधम), साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम जैसे ये 6 गुण जिस व्यक्ति के पास होते हैं, उसकी मदद भगवान भी करता है।

संस्कृत श्लोक (anskrit shlok) – jo jokhim leha hai udham sahas dhairya budhdi shakti aur parakram jaise ye 6 gun jis wyakti ke pass hote hai uski madad bhagwan bhi karta hai

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यम्,

भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्!

अर्थ – गायत्री मंत्र का अर्थ है कि हम सृष्टिकर्ता प्रकाशमान परमात्मा का ध्यान करते हैं, परमात्मा का तेज हमारी बुद्धि को सन्मार्ग की ओर चलने के लिए प्रेरित करें।

Gaytri Mantra ka Arth hai ki Ham srushtikarta Prakash Marne Parmatma Ka Dhyan Karte Hain Parmatma Ka tej Hamari Buddhi ko Sanmarg ki or chalne ke liye prerit karta hai

प्रभु आप ही इस सृष्टि के निर्माता हो, आप ही हम सब के दुःख हरने वाले हो, हमारे प्राणों के आधार हे परम पिता परमेश्वर, सृष्टि निर्माता मैंने आपका वर्ण कर रहा हूं।

Prabhu aap hi is Srishti ke Nirmata ho aap hi Ham Sab ke Dukh Harne wale Ho Hamare pranon ke Aadhar he parampita Parmeshwar Srishti Nirmata main aapka varn kar raha hun.

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